रविवार 30 अगस्त 2026 - 18:34
मुस्लिम उम्मत की सफलता की पहली शर्त एकता है

इस्लामी क्रांति के सर्वोच्च नेता ने सप्ताह-ए-वहदत के अवसर पर अपने संदेश में मुसलमानों के बीच एकता को कुरआनी रणनीति और इस्लाम-ए-नाब-ए-मुहम्मदी (सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम) की मूल शिक्षा बताते हुए कहा है कि वैश्विक कुफ्र के मुकाबले मुस्लिम उम्मत की एकता ही इस्लाम की प्रतिष्ठा और बुलंदी तथा सत्य की असत्य पर विजय की पहली शर्त है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, इस्लामी क्रांति के सर्वोच्च नेता ने पैगंबर-ए-अकरम हज़रत मुहम्मद मुस्तफा (स) और हज़रत इमाम जाफर सादिक (अ) के शुभ जन्मदिवस के अवसर पर ईरान की जनता और पूरी मुस्लिम उम्मत को बधाई देते हुए अपने संदेश में पैगंबर की सीरत को मार्गदर्शन, बंदगी, ज्ञान, नैतिकता, न्याय, सम्मान, संघर्ष, दया और एकता का पूर्ण आदर्श बताया। उन्होंने कहा कि मुस्लिम उम्मत इस समय इतिहास के एक निर्णायक चरण में है और मुसलमानों के पास वैश्विक कुफ्र के मुकाबले प्रभावी और इतिहास बनाने वाली भूमिका निभाने का अवसर पहले से कहीं अधिक है। लेकिन इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सबसे बुनियादी शर्त मुसलमानों के बीच एकता और आपसी भाईचारा है।

पूरा संदेश इस प्रकार है:

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

“मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं और जो लोग उनके साथ हैं, वे काफिरों के मुकाबले सख्त और आपस में अत्यंत दयालु हैं।”

महान सूर्य, सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ, प्रकाशमान दीपक, ईश्वर के चुने हुए, ज्ञान के नगर, संसार के लिए रहमत बनकर आए हज़रत मुहम्मद मुस्तफा, अल्लाह के सम्मानित रसूल (स) और उनकी पवित्र सीरत तथा पवित्र चरित्र वाले पुत्र, ईश्वर की पूर्ण हुज्जत, हज़रत इमाम जाफर सादिक (अ) के शुभ जन्मदिवस के अवसर पर मैं ईरान की सम्मानित जनता और महान इस्लामी उम्मत को बधाई देता हूं।

जिस समय हज़रत पैगंबर-ए-अकरम के अस्तित्व का सूर्य मक्का मुकर्रमा में उदित हुआ, उस समय मानव सुख और सफलता के क्षितिज पर, जो अल्लाह की पूर्ण बंदगी और आज्ञापालन से जुड़ा हुआ है, एक नई रोशनी पैदा हुई। पैगंबरों की आत्माएं, फरिश्ते और अल्लाह के निकट रहने वाले लोग खुशी से भर गए, जबकि इंसानों और जिन्नों के शैतान क्रोध, ईर्ष्या और दुख से अपनी उंगलियां चबाने लगे।

इसका कारण यह था कि पूरी असीम सृष्टि में अल्लाह की सबसे श्रेष्ठ रचना ने इस धरती पर कदम रखा था। बहुत जल्द उन्हें पैगंबरी और अंतिम पैगंबर होने का सम्मान प्राप्त होना था और वे अपने पवित्र हाथों में महान कुरआन लेकर इंसान के हर क्षेत्र में मार्गदर्शन के मिशन के साथ मानवता के महान कारवां को अल्लाह की बंदगी और उसकी ओर पूर्णता की यात्रा पर ले जाने वाले थे।

हज़रत पैगंबर (स) और उनके मासूम उत्तराधिकारियों का पूरा जीवन मार्गदर्शन और बंदगी, ज्ञान और प्रेम, आस्था और संघर्ष, श्रेष्ठ व्यक्तिगत और सामाजिक नैतिकता, अमानत और सच्चाई, सम्मान और गरिमा, ज्ञान और कर्म, दया और दृढ़ता, समानता और न्याय तथा एकता और भाईचारे का पाठ है। इन शिक्षाओं को जितना बेहतर तरीके से सीखा जाएगा और उन पर अमल किया जाएगा, मानव जाति के लिए सुख और सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचना उतना ही आसान होगा।

हमारा दृढ़ विश्वास है कि पैगंबर-ए-रहमत की पवित्र आत्मा और इसी तरह उनके पवित्र उत्तराधिकारियों और इमामों की पाक आत्माएं हमेशा मुसलमानों और इस्लामी समाज की परिस्थितियों पर नजर रखती हैं, उनका मार्गदर्शन करती हैं और उन पर कृपा करती हैं। जब इस दयालु और महान पिता की संतान से कोई गलती होती है तो उनका दिल दुखी होता है और जब भी मुसलमान उनकी शिक्षाओं और आदेशों पर अमल करते हैं तो उनका पवित्र हृदय प्रसन्न होता है।

आज इस्लाम और मुसलमान, इस्लाम के आरंभ से लेकर अब तक के सभी कठिन और अशांत दौर तथा उतार-चढ़ाव से गुजरने के बाद एक निर्णायक और इतिहास बदलने वाले चरण में पहुंच चुके हैं।

आज मुसलमान अत्यंत प्रभावी और इतिहास बनाने वाली भूमिका निभा सकते हैं। आज वह समय है जब सत्य की असत्य पर और इस्लाम की कुफ्र पर अंतिम विजय की संभावना अतीत के सभी दौरों की तुलना में कहीं अधिक वास्तविक हो चुकी है। इस महत्वपूर्ण लक्ष्य की पहली शर्त मुसलमानों के बीच एकता है।

वैश्विक कुफ्र के मुकाबले मुसलमानों की एकता एक कुरआनी रणनीति और इस्लाम-ए-नाब-ए-मुहम्मदी (स) की मूल शिक्षा है। यह कोई सतही या अस्थायी विषय नहीं है। एकता का अर्थ यह है कि इस्लामी समाजों में सभी मुसलमानों के साझा बिंदुओं को मूल आधार बनाया जाए। इसके साथ ही तर्क और प्रमाण के आधार पर, भाईचारे और एकजुटता की सभी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए तथा कुरआनी शिक्षाओं के अनुसार शांतिपूर्ण और मैत्रीपूर्ण वातावरण में मतभेद के विषयों को भी आपसी सहयोग में बदलने का प्रयास किया जाए।

यह स्पष्ट है कि वैश्विक कुफ्र का सामना करते समय सभी इस्लामी समाजों के मुसलमानों को कुरआन के इस सिद्धांत “काफिरों के मुकाबले सख्त और आपस में दयालु” को अपनी सोच, बातचीत और व्यवहार का आधार बनाना चाहिए। इसी तरह इस्लामी एकता और एकजुटता प्राप्त की जा सकती है।

यदि इस आसमानी संदेश का कोई भी हिस्सा मुसलमानों के व्यवहार से दूर हो गया तो वे उस सम्मान और प्रतिष्ठा के स्थान से भी दूर हो जाएंगे, जो उन्होंने इस्लामी समाज में सत्य के साथ प्राप्त किया था। यह एक अटल नियम है। यह नियम इस्लामी क्रांति के मूल सिद्धांतों और संदेशों में से एक है।

पहले एकता सप्ताह के आयोजन का इतिहास मार्च 1978 में पहलवी शासन के अत्याचार के खिलाफ संघर्ष के दौर से जुड़ा हुआ है। उस समय महान नेता और शहीद, जिनका दर्जा अल्लाह के निकट ऊंचा है, ने ईरानशहर में अपने निर्वासन के दौरान इस विचार को प्रस्तुत किया था। शिया और सुन्नी दोनों ने इस विचार का स्वागत किया।

इस्लामी क्रांति की सफलता के तुरंत बाद इस्लामी क्रांति के संस्थापक हज़रत इमाम खुमैनी (र) के प्रयासों से “सप्ताह-ए-वहदत” को आधिकारिक दर्जा दिया गया।

अल्लाह के फ़ज़्ल और कर्म से ईरानी राष्ट्र के लोगों के बीच एकता का विषय एक सफल उदाहरण बन चुका है और दुश्मनों की साजिशें इसे नुकसान पहुंचाने में सफल नहीं हो सकी हैं। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि बुरी नीयत रखने वाले लोग हमेशा इस महान नेमत को नुकसान पहुंचाने की ताक में रहते हैं।

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